जी मीडिया : “पत्रकार की पीड़ा” जब कलम अपनों के लिए चलती है
(ब्यूरो आजमगढ़)

पत्रकारिता केवल एक पेशा नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी है—सच को सामने लाने की, समाज को जागरूक करने की, और अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने की,लेकिन क्या होता है जब यही कलम अपनों के लिए चले और उसका जवाब ठुकराए जाने में मिले?
पत्रकार का जीवन दोहरी चुनौती से भरा होता है, एक तरफ समाज की सच्चाई सामने लाने की जिम्मेदारी, तो दूसरी ओर व्यक्तिगत जीवन की उलझनें,जब कोई पत्रकार अपने परिवार, अपने अपनों के संघर्ष और अन्याय के खिलाफ लिखता है, तो क्या उसे वही समर्थन मिलता है जो वह दूसरों के लिए आवाज उठाने पर पाता है? या फिर उसे यह एहसास कराया जाता है कि उसके अपने ही उसकी कलम की धार को सहन नहीं कर सकते?
पत्रकार की पीड़ा तब बढ़ जाती है जब उसे अपने ही लोगों के बीच अजनबी बना दिया जाता है, उसके शब्द, जो समाज के लिए मार्गदर्शक होते हैं, वही शब्द जब अपनों के हित में बोले जाते हैं, तो वे असहज कर देते हैं,यह विरोधाभास पत्रकार को अंदर से तोड़ने लगता है,
सवाल यह है कि क्या पत्रकारिता केवल बाहरी दुनिया के लिए होती है? क्या एक पत्रकार को अपने व्यक्तिगत जीवन में भी अपने अधिकारों और भावनाओं को दरकिनार करना चाहिए? अगर हाँ, तो क्या यह न्यायसंगत है?
पत्रकार की सबसे बड़ी पीड़ा यही है—जब वह कलम अपने ही लोगों के लिए चलाता है, और जवाब में उसे दरकिनार कर दिया जाता है,लेकिन यही संघर्ष उसकी लेखनी को और अधिक प्रखर बनाता है,वह दर्द को शब्दों में ढालता है, और शायद यही उसकी सबसे बड़ी ताकत भी होती है,
पत्रकार का दर्द उसकी ताकत भी है और उसकी परीक्षा भी,उसे समाज के साथ-साथ अपने अपनों से भी लड़ना पड़ता है,लेकिन अंत में, उसकी सच्चाई ही उसकी सबसे बड़ी पूंजी होती है। पत्रकार की पीड़ा को समझना और उसका सम्मान करना भी उतना ही ज़रूरी है, जितना उसकी कलम से निकले सच को स्वीकार करना।