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एनएसए के तहत निवारक निरोध की शक्तियों की वापसी की मांग, सीपीडीआरएस ने जताई आपत्ति

संवाददाता अंकित दूबे

बदलापुर जौनपुर। सेंटर फॉर प्रोटेक्शन ऑफ डेमोक्रेटिक राइट्स एंड सेक्युलरिज्म (सीपीडीआरएस) की अखिल भारतीय समिति ने राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (एनएसए) के तहत दिल्ली पुलिस आयुक्त को निवारक निरोध (प्रिवेंटिव डिटेंशन) की शक्तियां दिए जाने के केंद्र सरकार के निर्णय पर कड़ी आपत्ति जताई है। संगठन के पूर्वी उत्तर प्रदेश प्रभारी प्रमोद कुमार शुक्ल ‘मोनू’ ने इसे नागरिक अधिकारों और लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए चिंताजनक बताया।
प्रमोद कुमार शुक्ल ने कहा कि दिल्ली पुलिस ने अपने बयान में इसे एक नियमित प्रशासनिक प्रक्रिया बताते हुए स्पष्ट किया है कि एनएसए के तहत निवारक निरोध की शक्तियों का प्रत्यायोजन प्रत्येक तीन माह में नवीनीकृत किया जाता है। इसके बावजूद यह व्यवस्था अपने स्वरूप में दमनकारी है और इसका उपयोग किसी भी नागरिक, जन-आंदोलन अथवा शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन के विरुद्ध किया जा सकता है।
उन्होंने कहा कि निवारक निरोध एक असाधारण कानूनी शक्ति है, जिसका प्रयोग केवल राष्ट्रीय सुरक्षा पर उत्पन्न गंभीर खतरे की स्थिति में ही किया जाना चाहिए। पुलिस अधिकारियों को इस प्रकार की व्यापक शक्तियों का नियमित रूप से दिया जाना संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत प्राप्त शांतिपूर्ण सभा, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और संगठन बनाने के अधिकारों के लिए खतरा उत्पन्न करता है।
सीपीडीआरएस ने केंद्र सरकार से मांग की है कि पुलिस को एनएसए के तहत निवारक निरोध की शक्तियां नियमित रूप से प्रत्येक तीन माह में बढ़ाने की परंपरा तत्काल समाप्त की जाए। साथ ही शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों, छात्र कार्यकर्ताओं और नागरिक आंदोलनों के विरुद्ध एनएसए के प्रयोग से बचा जाए तथा एनएसए के तहत निरुद्ध सभी व्यक्तियों के मामलों में संविधान के अनुच्छेद 22 के अंतर्गत उपलब्ध सभी संवैधानिक सुरक्षा उपायों का कड़ाई से पालन करते हुए पूरी पारदर्शिता सुनिश्चित की जाए।

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