वार्ड नंबर 10: सड़क नहीं, उपेक्षा की मिसाल
कप्तानगंज के वार्ड नंबर 10 में एक सड़क है—सड़क क्या कहें, मानो ज़मीन के नक्शे पर किसी भूले-बिसरे ग्रह का टुकड़ा हो! ऐसा लगता है कि यह कप्तानगंज में नहीं, बल्कि किसी दूसरे युग में स्थित है, जहाँ विकास और सुविधा जैसे शब्दों का कभी आगमन ही नहीं हुआ। सड़क की हालत ऐसी कि चलते समय आपको एहसास होगा कि आप आधुनिक भारत में नहीं, बल्कि इतिहास के किसी धूल-धूसरित पन्ने में दाखिल हो चुके हैं।

और मज़े की बात यह है कि इस पर न तो वार्ड मेम्बर की नज़र पड़ती है, न नगर पंचायत अध्यक्ष की। उनकी व्यस्तता शायद इतनी बढ़ गई है कि वार्ड की ज़मीनी हकीकत से उनका कोई वास्ता ही नहीं रहा। जनता के पैरों के नीचे कीचड़ भले ही धंस जाए, लेकिन कुर्सियों पर बैठे महानुभावों को क्या फर्क पड़ता है! उनके लिए तो हर सड़क चुनावी घोषणा पत्र का एक पन्ना भर होती है, जिसे बस वोट मिलने तक याद रखा जाता है।
गटर बनाम समय यात्रा
अब ज़रा इन नालियों पर गौर कीजिए। यहाँ गंदा पानी इस तरह बहता है जैसे हम समय में दो दशक पीछे चले गए हों, जब ड्रेनेज सिस्टम केवल कल्पनाओं में ही था। पहले तो यह पानी सिर्फ़ घरों में सीलन भरता था, अब तो ऐसा लग रहा है कि घर की नींव भी धीरे-धीरे घुलने लगी है। लेकिन इससे नेताओं को क्या लेना-देना? यह तो जनता की समस्या है, जिसे भुगतना है, वह भुगते!
नेताओं की याददाश्त और मच्छरों का साम्राज्य
बीमारी, मच्छर, और कीड़े—इन्हें तो अब यहाँ स्थायी नागरिकता मिल गई है। किसी के घर में बिना इजाजत घुसने का हुनर इनसे सीखना चाहिए। और रही बात जनता की, तो चुनाव के समय जो नेता साल भर में सड़कें सुधारने का वादा करते थे, अब वे उसी वादे को हर पांच साल बाद दोहराने में व्यस्त हैं। आखिर नेता जो ठहरे!
सब चलता है… जब तक खुद को तकलीफ़ ना हो
आजकल सबको अपनी-अपनी पड़ी है। जब तक खुद का फायदा हो, तब तक सब बढ़िया है। लेकिन अगर समस्या से निपटना पड़े या आवाज़ उठानी पड़े, तो वही चीज़ कठिनाई बन जाती है। अब बस इंतजार है कि कब कोई नेता ‘नींद’ से जागेगा और इस वार्ड की बदहाली पर नज़र डालने की जहमत उठाएगा।
काम तो बहुत होता है, पर कहां होता है?
नेताओं की माने तो वो दिन-रात मेहनत कर रहे हैं, लेकिन मेरे वार्ड में तो वह मेहनत दिखाई नहीं देती। यहाँ तो अब भी लोग कूड़ा ऐसे फेंकते हैं जैसे ज़मीन ने खुद ही इसे समेट लेने की कसम खा रखी हो। आसपास रहने वालों को तकलीफ़ हो रही है, इससे किसे फर्क पड़ता है? नेताओं को तो बिल्कुल नहीं।
अब तो बस भगवान का ही सहारा है! देखते हैं, कब वह ज़िम्मेदार लोगों को सद्बुद्धि देगा और कब इस वार्ड की बदहाली का अंत होगा। तब तक हम इंतजार करें, या फिर अगली चुनावी सभा में एक और जुमला सुनने की तैयारी करें
—“इस बार ज़रूर सुधार होगा!”