वर्तमान परिस्थितियों के बीच चल रही इंदिरा गांधी की चर्चाओं में एक पुराना किस्सा याद आ गया तथाकथित आयरन लेडी का , पढ़िए यदि समय हो तो…. 😊
इंदिरा गांधी प्रतिभा प्रतिष्ठान घोटाला — जब करोड़ों की रिश्वत से हिली थी सत्ता।

वर्ष 1980, देश की राजनीति में एक नया मोड़ आया था। इंदिरा गांधी ने सत्ता में वापसी की और आते ही महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री शरद पवार को पद से हटाकर अब्दुल रहमान अंतुले को मुख्यमंत्री नियुक्त किया। अंतुले, इंदिरा गांधी के कट्टर समर्थक थे, जिन्होंने आपातकाल के दौरान उनका साथ दिया था और कांग्रेस के विभाजन के बाद इंदिरा कांग्रेस को महाराष्ट्र में संगठित करने का दायित्व निभाया था। हालांकि मराठा लॉबी इससे नाराज़ थी, परंतु इंदिरा गांधी ने इसकी कभी परवाह नहीं की।
सरकार तो चलने लगी, लेकिन जल्द ही पर्दे के पीछे चल रहे काले खेल का भंडाफोड़ होने वाला था।
उस दौर में इंडियन एक्सप्रेस अखबार के संपादक श्री अरुण शौरी थे, जिन्हें बाद में खोजी पत्रकारिता के प्रतीक के रूप में पहचाना जाने लगा। एक दिन उनके पास एक प्रसिद्ध डॉक्टर मिलने आए। डॉक्टर साहब ने बताया कि वे एक अस्पताल खोलना चाहते हैं, लेकिन मुख्यमंत्री कार्यालय में उनकी फाइल अटक गई है। कारण — मंजूरी तभी मिलेगी जब वे 5 करोड़ रुपये एक ट्रस्ट को “दान” देंगे। यही कहानी कुछ अन्य उद्योगपतियों ने भी सुनाई थी।
इस ट्रस्ट का नाम था — इंदिरा गांधी प्रतिभा प्रतिष्ठान।
अरुण शौरी ने पहली बार इस ट्रस्ट का नाम सुना था। उन्होंने अपने सहयोगी पत्रकार गोविंद तलवलकर को इसकी तह तक जाने का निर्देश दिया।
तफ्तीश शुरू हुई, लेकिन किसी को इस ट्रस्ट के बारे में ठोस जानकारी नहीं थी। आखिरकार सचिवालय बीट के एक पत्रकार ने पता लगाया कि यह ट्रस्ट कोयना बांध पुनर्वास कार्यालय के एक छोटे से कमरे में संचालित होता है।
जब खोजी पत्रकार वहां पहुंचे तो पाया कि महज दो लोग — एक कैशियर और एक टाइपिस्ट — उस “प्रतिष्ठान” को संभालते थे। बाहर एक छोटा सा बोर्ड लगा था, जो मुश्किल से दिखता था।
जांच में पता चला कि लंच ब्रेक के दौरान दोनों कर्मचारी बाहर जाते थे। पत्रकारों ने इसी समय का लाभ उठाया और कमरे में घुसकर देखा कि ट्रस्ट के नाम से 102 चेक विभिन्न स्रोतों से प्राप्त हुए थे, जिनकी एंट्री एक रजिस्टर में दर्ज थी। उन्होंने चेक नंबर और बैंक विवरण नोट कर लिया।
लेकिन अरुण शौरी संतुष्ट नहीं हुए। उनका कहना था कि जब तक इन दस्तावेजों की फोटोकॉपी नहीं होती, मामला मजबूत नहीं होगा।
अगले दिन पत्रकारों ने खुद को ऑडिट टीम बताकर दस्तावेजों की फोटोकॉपी कर ली। अब चेक और रजिस्टर की प्रतियां शौरी के पास थीं। मगर सवाल बना रहा — कैसे साबित होगा कि ये चेक रिश्वत के रूप में लिए गए थे?
तब एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी की मदद ली गई, जो उस वक्त शंटिंग में थे। उन्होंने जांच में खुलासा किया कि जिन-जिन तारीखों पर चेक ट्रस्ट को मिले थे, उन्हीं तारीखों पर संबंधित व्यापारियों के पक्ष में कोई न कोई सरकारी निर्णय कैबिनेट में पारित हुआ था —
होटल को जमीन आवंटित करने का आदेश और उसी दिन होटल मालिक का चेक।
बीयर बार एसोसिएशन का चेक और उसी दिन डांस परमिट की मंजूरी।
यह सिलसिला सीमेंट और चीनी की रियायतों तक फैला था। उस समय देश में सीमेंट और चीनी की राशनिंग थी और इन्हें परमिट के जरिए जारी किया जाता था। जिन कंपनियों ने ट्रस्ट को चेक दिया, उन्हें लगातार छूट मिली; जिन्होंने नहीं दिया, उनकी सप्लाई रोक दी गई।
यह एक सुनियोजित रिश्वत तंत्र था।
अब खबर छापने की बारी थी। खुद अरुण शौरी रात 11 बजे तक कंपोजिंग में लगे रहे ताकि खबर लीक न हो।
लेकिन बात लीक हो गई। मुख्यमंत्री अंतुले का फोन इंडियन एक्सप्रेस के मालिक श्री रामनाथ गोयनका के पास आया। गोयनका ने साफ शब्दों में कह दिया — “मैं संपादकीय मामलों में हस्तक्षेप नहीं करता।” और फोन काट दिया।
अगले दिन अखबार में सनसनीखेज खबर छपी —
“इंदिरा गांधी के नाम पर व्यापार!”
देश में हंगामा मच गया। संसद में सवाल उठा। तब वित्त मंत्री आर. वेंकटरमण ने जवाब दिया कि इंदिरा गांधी को इस ट्रस्ट के बारे में कोई जानकारी नहीं है।
लेकिन इंडियन एक्सप्रेस ने अगले ही दिन एक और खबर छाप दी —
“झूठ बोल रहे हैं आप वित्त मंत्री जी”
साथ में ट्रस्ट के उद्घाटन समारोह की तस्वीर छापी गई, जिसमें इंदिरा गांधी खुद मौजूद थीं।
मामला इतना तूल पकड़ गया कि मुख्यमंत्री अब्दुल रहमान अंतुले को इस्तीफा देना पड़ा।
बताया जाता है कि समाजवादी नेता मृणाल गोरे ने इस पर मुकदमा भी दायर किया था, और डर था कि इंदिरा गांधी तक इसकी आंच न पहुंचे।
इसलिए अंतुले को बलि का बकरा बनाकर बर्खास्त कर दिया गया।
यह घटना भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में खोजी रिपोर्टिंग की स्वर्णिम मिसाल बन गई।
जब मीडिया ने सत्ता की चूलें हिलाईं और लोकतंत्र में जवाबदेही की नई परंपरा कायम की।