पत्रकारिता एक मिशन, चुनौतियां अनेक
जी न्यूज 7 अंकित दूबे जौनपुर

पत्रकारिता एक रचना शील विद्या है। इसके बिना समाज को बदलना असंभव है। इसे मौसमी पक्षी यूं ही नहीं कहा जाता। पत्रकार जिस प्रकार मौसम और हालात की परवाह किए बगैर अपने कर्तव्य को निभाने में जिस तरह दिन रात एक किए रहता है। कोई मामूली काम नहीं है। लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ पत्रकारिता को यूं ही नहीं कहा जाता है, इसकी भूमिका समझने के लिए हमें इसके महत्व पर गौर करना होगा। मानव का यह हमेशा से स्वभाव रहा है कि उसका अंतर्मन हमेशा समाज, क्षेत्र, देश और विदेश के बारे में कहां, कब, कैसे, क्यों आज के उत्तर को पाने की उत्सुकता और लालसा बनी रहती है। समाज की इन सभी जिज्ञासाओं को शांत करने का कार्य करने वाला एकमात्र साधन पत्रकार ही है। आज के हालात में पत्रकार अपने जोश और जनता के प्रति जवाबदेही को किस प्रकार संभव बना रहा है। दिन—प्रतिदिन इस प्रकार की खबरें अखबारों तथा न्यूज चैनलों पर आती रहती हैं कि फिलहाल पत्रकार पर हमला या पत्रकार की हत्या इस तरह देखा जाए तो हमारा पत्रकार किस प्रकार अपनी जान को जोखिम में डालकर अपना कर्तव्य निर्वहन कर रहा है। यह किसी से छिपा नहीं है।
जब हम सुबह नाश्ता करने बैठते हैं तो सबसे पहले हमें अपनी टेबल पर हम अखबार पढ़ना पसंद करते हैं, क्या किसी ने सोचा है कि इन खबरों का संग्रहण करने को पत्रकार क्या नहीं करता। संस्थान क्षेत्रीय पत्रकार से केबल काम लेते है उसे कोई सैलरी नहीं देते, क्या उसका परिवार नहीं है। उसको अपने परिवार के भरण पोषण को कुछ सैलरी तो चाहिए इस पर न तो संस्थान कोई कदम उठाता है और न ही सरकार। वहीं किसी बड़े वैनर के पत्रकार इन क्षेत्रीय पत्रकारों को फर्जी बताने तनिक भी नहीं चूकते और संस्थान भी संकट आने पर इनको अपना बताने से इनकार कर देता है। मेरी राय में पत्रकार से बड़ा देशभक्त कोई नहीं जो केवल अपने ग्लैमर के लिए निस्वार्थ समाज के लिए काम करता है।
संगठन सर्वोपरि है, संगठन के बिना हम कुछ भी नही पत्रकारिता आजादी के पहले से लेकर आज तक समाज सेवा ही रही है किन्तु ऐसे कुछ लोग पत्रकारिता में आ गए है जो इसे व्यवसाय बना लिए है। वर्तमान चकाचौध में आज भी पत्रकारिता को जनसेवा और पत्रकार को जनसेवक कहा जाए तो अतिश्योक्ति न होगी।
एक बार ऐसे ही जौनपुर नगर के रोडवेज तिराहा पर चाय खाने में रोजाना की तरह कुछ राजनीतिज्ञों, पत्रकारों, बुद्धजीवियों का जमावड़ा था। बात आते—आते पत्रकारिता पर रुक गई। “पत्रकार चाटुकार हो गए है” एक राजनीतिज्ञ ने सीधे प्रहार किया। “राजनीतिज्ञ भ्रष्ट हो गए है” पत्रकार भला क्यों चूकते..? इस प्रकार दोनों एक—दूसरे पर दोषारोपण करते रहे। पास बैठे अन्य लोगों में भी कुछ प्रकार की तरफ से तो कुछ राजनीतिज्ञ की ओर से समर्थन देकर बहस को आगे बढ़ाने में मदद दे रहे थे। मैं चुपचाप उनकी बातों को सुनता रहा। जब बर्दाश्त नहीं हुआ उठकर चल पड़ा। घर आकर भी मेरे दिमाग में वही बाते बराबर गूंजती रही और काफी रात तक मैं आत्मचिंतन करता रहा। जेहन में एक ही सवाल कुलबुलाता रहा “क्या पत्रकार वाकई चाटुकार हो गए है”…? अपने परिवेश पर नजर डाले तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि समय से हर चीज प्रभावित होती है। समाज, संस्कृति, दर्शन सब समय से प्रभावित हुए है, फिर इस संस्करण काल में पत्रकारिता भी प्रभावित हो गई हो तो बहुत ज्यादा आश्चर्य की बात नहीं है।
पहले उद्देश्य पूरक पत्रकारिता हुआ करती थी। उसका एक मिशन था किंतु जब से यह व्यवसायिक हो गई इसके उद्देश्य पर गहरा असर पड़ा है और आज स्थिति यह हैं कि किधर जाए? एक तरफ उद्देश्य है, अभाव है, असुरक्षा है तो दूसरी तरफ सुविधा है, संपन्नता है, सम्मान है। पत्रकार जो दूसरों को आलोचना करते है वह आज स्वय आलोचना के शिकार हो रहे हैं। ऐसा इसलिए हुआ कि हम सुविधा भोगी हो चुके है इसी कारण हमारा शोषण हो रहा है। आज यदि ईमानदारी से देखा जाए तो सबसे अधिक शोषण पत्र मालिक पत्रकारों का ही कर रहे है। वे सुविधा उन्ही को दे रहे है जो उन्हें प्रति वर्ष लाखों रुपए के विज्ञापन देते है। लेख, फीचर, समाचारों पर परिश्रम करने वाले पत्रकारों का पत्र मालिको के यहां कोई अहमियत नहीं रह गई है। इसका परिणाम यह हो गया है कि पत्रकार प्रारकारिता को कम, विज्ञापन पर अधिक ध्यान देने लगे हैं। वैसे आज भी कुछ साहसी एवम आदर्शवादी प्रकार साथी इस “दाग” को मिटाने में लगे है। पत्रकारिता लोकतंत्र का अविभाज्य अंग है। प्रतिपाल परिवर्तित होने वाले जीवन और जगत का दर्शन पत्रकारिता द्वारा ही सम्भव है। आज समाज जिस अवस्था में है, पत्रकारिता की सक्रियता का ही परिणाम है। पत्रकारिता समाज की विभिन्न गतिविधियों का दर्पण है।
अंकित दूबे ( ब्यूरो चीफ) जौनपुर
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