बाढ़ प्रभावित किसानों को बांस खेती और नर्सरी प्रबंधन का प्रशिक्षण
संवादाता सिरजेश यादव
खड्डा (कुशीनगर),
संवाददाता।


सीबार्ट (सेंटर फॉर इंडियन बैम्बू रिसोर्स एंड टेक्नोलॉजी) एवं सस्टेनेबल ह्यूमन डेवलपमेंट एसोसिएशन (एसएचडीए) के संयुक्त तत्वावधान में टाटा ट्रस्ट समर्थित समुदाय आधारित बाढ़ अनुकूलन क्लस्टर मॉडल परियोजना के तहत 28 से 30 मई तक तीन दिवसीय बांस खेती, नर्सरी स्थापना एवं क्षमता विकास प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन ग्राम नरकहवा व कटाई भरपूरवा स्थित पंचायत भवन में किया गया। कार्यक्रम में खड्डा क्षेत्र के 85 से अधिक बाढ़ प्रभावित किसानों, विशेषकर महिलाओं, ने भाग लिया।
कार्यक्रम में सीबार्ट के वरिष्ठ अनुसंधान सलाहकार डॉ. क्षितिज मल्होत्रा ने किसानों को बांस की खेती, उसके आर्थिक महत्व तथा नर्सरी तैयार करने की विधि की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि बांस को अब घास की श्रेणी में रखा गया है और किसान इसे अन्य फसलों की तरह उगाकर बाजार में बेच सकते हैं। उन्होंने नर्सरी संवर्धन का व्यावहारिक प्रदर्शन भी किया।
डॉ. बी.एम. त्रिपाठी ने कहा कि गंडक नदी से होने वाली बाढ़ और भूमि कटान की समस्या से निपटने में बांस एक प्रभावी विकल्प साबित हो सकता है। इससे भूमि संरक्षण के साथ किसानों की आय बढ़ाने में भी मदद मिलेगी।
सीबार्ट की निदेशक के. रत्ना ने बताया कि उत्तर प्रदेश में बांस की खेती अभी बहुत कम क्षेत्र में हो रही है। किसान इसे अपनाकर बंजर भूमि को उपयोगी बना सकते हैं। उन्होंने महिला किसानों को बांस शिल्प उत्पादों के निर्माण एवं विपणन के माध्यम से अतिरिक्त आय अर्जित करने के लिए प्रेरित किया।
सीबार्ट के मॉनिटरिंग ऑफिसर अरविंद कुमार ने कहा कि बांस बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में भूमि संरक्षण और आजीविका संवर्धन का प्रभावी साधन है। इसके साथ किसान अंतरवर्ती फसलों की खेती भी कर सकते हैं। प्रशिक्षण के दौरान मास्टर ट्रेनर मनोज यादव ने बांस कटिंग एवं शिल्प निर्माण से जुड़े उपकरणों का प्रदर्शन किया। कार्यक्रम में सागर कुमार, सुनील राव, तारा चंद कुशवाहा और मोहन कुशवाहा भी उपस्थित रहे।